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portada NARMADA KI SUBAH (en Hindi)
Formato
Libro Físico
Año
2026
Idioma
Hindi
N° páginas
246
Encuadernación
Tapa Dura
Dimensiones
21.60 x 14.00 x 1.70 cm
ISBN13
9789358693607

NARMADA KI SUBAH (en Hindi)

Gajanan Madhav Muktibodh (Autor) · PRALEK PRAKASHAN · Tapa Dura

NARMADA KI SUBAH (en Hindi) - GAJANAN MADHAV MUKTIBODH

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Reseña del libro "NARMADA KI SUBAH (en Hindi)"

◆उन दिनों नागपुर ही मध्यप्रदेश राज्य की राजधानी हुआ करता था। शासन के सूचना प्रकाशन विभाग में पत्रकार की हैसियत से काम करते मुक्तिबोध वहीं काम करते अपनी तरह के अनूठे व्यंग्य-कवि 'विद्रोही' और उनके मार्फत प्रदेश के दूसरे तरुण कवियों-लेखकों से भी जुड़ गए। नागपुर आकर उन्हें लगा कि वह अकेले नहीं हैं और मरने-मारने को तत्पर एक छोटी-सी सिल टोली उनके साथ है जो नई कविता की फ़ैशनेबल सौन्दर्याभिरुचि से दूर रहकर काव्य की मूल प्रगतिशील धारा के सम्बर्धन में योग दे रही है। 'दूसरा सप्तक' छप चुका था। मुक्तिबोध को यह देखकर हैरानी हुई कि नई कविता के नाम से प्रस्तुत छठे दशक की कविता 'तारसप्तक' के मूलतः वामपन्थी रुझान को छाँट-तराशकर कोरमकोर सौन्दर्यपरक बनती जा रही है। ऐसा तो छायावाद के ज़माने में भी नहीं हुआ था। तो क्या यह सब उनके नव-स्वाधीन देश को अन्तर्राष्ट्रीय पूँजीवाद के गिरफ्त में रहे चले आने के लिए ही किया जा रहा है? उन्हें लगा कि लड़ाई मात्र कलामूल्यों की नहीं है। इसे 'राजनीतिक शीतयुद्ध की साहित्यिक शास्त्रा' नाम देते हुए विरोधियों से जूझने के लिए वह खुले मैदान में उतर आए। एकदम नए और अपरिचित कवियों के अटपटे किन्तु तेजस्वी स्वर उनके आसपास हवा में लहरा रहे थे जिससे उनकी यह धारणा और पुष्ट हुई कि प्रगतिशील कविता मरी नहीं है, सिर्फ भूमिगत है। इन कवियों से हिन्दी संसार को परिचित कराने के ख़याल से उन्होंने 'नर्मदा की सुबह' नाम से एक कविता-संकलन प्रकाशित करने की भी योजना बनाई थी।

मुक्तिबोध ने आधुनिक भावबोध को नई कविता का मूल प्राण मानते हुए भी सीधे सवाल किया कि वह आधुनिक भाव-बोध 'पश्चिमी जगत के व्यक्तिवादी-निराशावादी दर्शन से अनुप्राणित हो अथवा भारत के अपने भविष्य-दर्शन से।' माना कि दुनिया छोटी होती जा रही है और नई कला, नई कविता 'स्

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El libro está escrito en Hindi.
La encuadernación de esta edición es Tapa Dura.

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